चम्बल (चंबल) नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह नदी “जानापाव पर्वत ” बाचू पाईट महू से निकलती है। इसका प्राचीन नाम “चरमवाती ” है। इसकी सहायक नदियाँ शिप्रा, सिन्ध (सिंध), काली सिन्ध, ओर कुनू नदी है। यह नदी भारत में उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में राजस्थान के कोटा तथा धौलपुरमध्य प्रदेश के धारउज्जैनरतलाममन्दसौरभिंडमुरैना आदि जिलों से होकर बहती है।[2] यह नदी दक्षिण की ओर मुड़ कर उत्तर प्रदेश राज्य में यमुना में शामिल होने के पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच सीमा बनाती है। इस नदी पर चार जल विधुत परियोजना -गांधी सागर, राणा सागर, जवाहर सागर और कोटा बैराज (कोटा)- चल रही है।[3] प्रसिद्ध चूलीय जल प्रपातचम्बल (चंबल) नदी (कोटा) मे है। कुल लम्बाई 135। राजस्थान की औधोगिक नगरी कोटा इस नदी के किनारे स्थित है।

यह एक बारहमासी नदी है। इसका उद्गम स्थल जानापाव की पहाड़ी (मध्य प्रदेश) है।[4] यह दक्षिण में महू शहर के, इन्दौर (इंदौर) के पास, विन्ध्य (विंध्य) रेंज में मध्य प्रदेश में दक्षिण ढलान से होकर गुजरती है। चम्बल और उसकी सहायक नदियाँ उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के नाले, जबकि इसकी सहायक नदी, बनास, जो अरावली पर्वतों से शुरू होती है इसमें मिल जाती है। चम्बल, कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह के पास पचनदा में, उत्तर प्रदेश राज्य में भिण्ड (भिंड) और इटावा जिले की सीमा पर शामिल पाँच नदियों के सङ्गम (संगम) समाप्त होता है।

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हम सभी शनिदेव की महिमा से भली भांति परिचित होंगे। देश भर में कई चमत्कारिक शनि मंदिर हैं। जहाँ शनि देव की महिमा अमरमपार है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर के समीप एंती गांव हैं जहाँ पर विराजित शनि देव का देश भर में विशेष महत्व है। भगवान हनुमान रावण की कैद से छुड़वा कर शनि देव को यहीं पर लाये थे। तब से यहाँ पर शनि देव विराजमान हैं। बताया यह भी जाता है कि यहाँ शनि मंदिर पर प्रतिष्ठित शनि देव की प्रतिमा आसमान से टूट कर गिरे एक उल्कापिंड से निर्मित है जिससे यह स्थान विशेष प्रभावशाली है। बताया जाता है कि आज भी यहाँ अमर रूप में शनि देव विराजमान हैं। शनि देव के चमत्कार को देखते हुए ग्वालियर के सिंधिया राज घराने द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था।

 

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रावण की कैद से छुड़वा कर बजरंगी ने शनि देव को छोड़ा था यहाँ

शनि देव की महिमा के आगे सब बेअसर होता है। जिस पर शनि देव की दिव्य दृष्टि पड़ जाए समझ लो वह भव सागर से पार हो जाता है। मुरैना जिले में आने वाले इस शनिचरा मंदिर के बारे में एक कथा विख्यात है। बताया जाता है कि जब भगवान महाबली हनुमान रावण की लंका जलाने वाले थे तब उनकी नजर उस जगह पर पड़ी जहाँ पर रावण ने अन्य देवताओं के साथ ही शनि देव को भी बंदी बना रखा था। शनि देव ने हनुमानजी से रावण की कैद से छुड़ाने का आग्रह किया। जिसके बाद हनुमान ने शनि देव को रावण की कैद से छुड़वाया। रावण की कैद में रहने से शनि देव कमजोर हो गए थे तो उन्होंने हनुमान से विनती करी कि वे उन्हें किसी सुरक्षित जगह पर भेज दें। जिसके बाद हनुमान ने शनि देव को यहाँ पर बने पर्वत पर लाकर छोड़ दिया। शनि देव के प्रकोप से ही रावण की लंका तो जली ही साथ ही साथ उसके कुल का भी विनाश हो गया।

जहाँ शनि देव गिरे वहाँ आज भी हैं गड्ढा

मुरैना जिले में स्थित शनिचरा मंदिर के चमत्कार किसी से नहीं छुपे हैं। यहाँ पर लोगों की अपार आस्था है। शनि देव सबकी मुरादें भी पूरी करते हैं। बताया जाता है कि जब शनि देव को रावण की कैद से छुड़वा कर हनुमानजी ने उन्हें यहाँ छोड़ा था तो शनि देव जिस जगह गिरे थे वहाँ एक बड़ा-सा गड्ढा हो गया था। यह गड्ढा आज भी यहाँ पर मौजूद है। शनिवार एवं शनिश्चरी अमावस्या के दिन आज भी यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

चमत्कार से प्रभावित होकर महाराजा सिंधिया ने करवाया था मंदिर का जीर्णोद्धार

भगवान शनि देव इस चमत्कारिक जगह पर त्रेतायुग में आकर विराजमान हुए थे। बताया जाता है कि यहाँ पर शनि देव के मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था। जिसके बाद शनि देव की महिमा एवं चमत्कारों से प्रभावित होकर ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा दौलतराव सिंधिया ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। वर्तमान में यह मंदिर मध्य प्रदेश सरकार के अधीन है। जिसका प्रबंधन मुरैना जिला प्रशासन द्वारा किया जाता है।

शनि जयंती पर लगता है विशाल मेला

बताया जाता है कि शनिश्चरा मंदिर पर्वत से ही महाराष्ट्र के सिगनापुर शनि मंदिर में प्रतिष्ठित शनि शिला ले जाई गई है। जब से यहाँ शनिदेव विराजित हुये हैं तब से ग्वालियर क्षेत्र में लौह उत्पादन काफी बढ़ा है। शनि देव की कृपा एवं महिमा को देखते हुए यहाँ हर वर्ष शनि जयंती पर विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है। हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को शनि जयंती के अवसर पर लगने वाले मेले में देश भर से यहाँ भक्त अपनी मुराद लेकर पहुँचते हैं और शनि देव उनकी हर मुराद पूरी करते हैं।

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ग्वालियर. शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर मुरैना में सिहोनिया स्थित ककनमठ मंदिर आज देश-विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। कभी सिंहपाणि नगर कहा जाने वाला सिहोनिया विश्व पर्यटन के मानचित्र में ककनमठ मंदिर के कारण जाना जाता है।
ककनमठ मंदिर के बारे में जानकारी…
<ककनमठ मंदिर का निर्माण 11 वीं शताब्दी में कछवाहा वंश (कच्छप घात) के राजा कीर्ति राज ने कराया था। उनकी रानी ककनावती भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। उसी कहने पर इस इसका नाम ककनमठ रखा गया।< div>

< ककनमठ मंदिर उत्तर भारतीय शैली में बना है। उत्तर भारतीय शैली को नागर शैली के नाम से भी जाना जाता है। आठवीं से वीं शताब्दी के दौरान मंदिरों का निर्माण नागर शैली में ही किया जाता रहा। ककनमठ मंदिर इस शैली का उत्कृष्ट नमूना है।

< ककनमठ मंदिर के निर्माण में कहीं भी चूने-गारे का उपयोग नहीं किया गया। पत्थरों को संतुलित रखकर मंदिर बनाया गया। इतने लंबे समय से यह मंदिर कई प्राकृतिक झंझावातों का सामना करता आ रहा है। मौसम की मार से यहां बने छोटे-छोटे मंदिर नष्ट हो गए।

< मंदिर को लेकर एक किंवदंती यह भी है कि इसे भूतों ने एक रात में बनाया था, लेकिन इसे बनाते- बनाते सुबह हो गई और भूतों को काम अधूरा छोड़कर जाना पड़ा। आज भी इस मंदिर को देखने पर यही लगता है कि इसका निर्माण अधूरा रह गया।

< ककनमठ मंदिर की देखरेख अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) कर रही है। अफसरों को भय था कि यदि मंदिर को छेड़ा गया, तो यह गिर सकता है, क्योंकि इसके पत्थर एक के ऊपर एक रखे हैं। इस कारण उन्होंने इसके संरक्षण कार्य से दूरी बना ली ।
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